सुप्रीम कोर्ट ने 21 जुलाई को एक अहम स्वतः संज्ञान याचिका पर सुनवाई निर्धारित की है, जिसमें जांच एजेंसियों द्वारा वकीलों को पूछताछ के लिए तलब किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई गई है। यह मामला तब उभरा जब कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने यह मुद्दा उठाया कि विभिन्न जांच एजेंसियां – जैसे प्रवर्तन निदेशालय (ED), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), और अन्य – ऐसे अधिवक्ताओं को पूछताछ के लिए बुला रही हैं जो अपने मुवक्किलों के मामलों से संबंधित हैं या उनके पक्ष में दस्तावेज तैयार करते हैं।
इस याचिका में विशेष रूप से एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड को जांच के नाम पर तंग किए जाने का मुद्दा उठाया गया है, जिससे अधिवक्ता–मुवक्किल गोपनीयता (attorney-client privilege) का उल्लंघन हो रहा है। यह गोपनीयता एक मूलभूत कानूनी सिद्धांत है, जो अधिवक्ता और उसके मुवक्किल के बीच की बातचीत को संरक्षित करता है और उस पर जांच एजेंसियों द्वारा हस्तक्षेप करना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा रहा है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया और कई वरिष्ठ वकीलों ने इस विषय पर चिंता जताई है कि वकीलों को मुवक्किल के कार्यों के लिए जिम्मेदार ठहराना एक खतरनाक प्रवृत्ति है, जिससे न्याय प्रणाली की निष्पक्षता और वकालत के पेशे की स्वतंत्रता पर खतरा उत्पन्न होता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली पीठ ने स्वयं इस मुद्दे पर संज्ञान लेते हुए स्पष्ट किया कि यदि जांच एजेंसियों द्वारा वकीलों को बार-बार पूछताछ के लिए बुलाया जाता रहा तो यह पेशेवर स्वतंत्रता पर गंभीर आघात होगा और इससे न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट यह भी जांच करेगा कि क्या किसी भी वकील को केवल अपने मुवक्किल के दस्तावेज तैयार करने या उनके पक्ष में कानूनी सलाह देने मात्र पर संदेह के घेरे में लाया जा सकता है। कोर्ट के इस रुख को वकीलों के समुदाय द्वारा एक अहम हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है जो कि वकालत के पेशे की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवश्यक है।




