भारत में अधिवक्ता केवल मुवक्किलों के प्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि न्यायालय के अधिकारी (Officers of the Court) भी हैं। उनका दायित्व न्याय की रक्षा करना और विधि के शासन (Rule of Law) को कायम रखना है। किंतु कई बार पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान अधिवक्ता पुलिस प्रशासन से टकराव या दुव्यवहार का शिकार हो सकते हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि अधिवक्ता अपने संवैधानिक अधिकारों, अधिवक्ता अधिनियम, 1961 तथा बार काउंसिल नियमों के अंतर्गत उपलब्ध सुरक्षा और उपायों से भली-भांति परिचित हों।
1. अधिवक्ताओं के संवैधानिक अधिकार
भारत का संविधान सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जिनका लाभ अधिवक्ता भी पेशेवर दायित्व निभाते समय ले सकते हैं।
प्रमुख प्रावधान:
- अनुच्छेद 19(1)(g): किसी भी व्यवसाय या पेशे का अधिकार। अधिवक्ताओं के लिए यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि वे बिना अनुचित हस्तक्षेप के विधि व्यवसाय कर सकें।
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार। इसमें गरिमा से जीने तथा निष्पक्ष प्रक्रिया का अधिकार शामिल है। यदि पुलिस द्वारा अधिवक्ता के साथ दुर्व्यवहार या उत्पीड़न किया जाता है, तो यह अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन है।
- अनुच्छेद 22: मनमाने ढंग से गिरफ्तारी और निरोध से सुरक्षा। अधिवक्ता भी इस अनुच्छेद के तहत विधिसम्मत प्रक्रिया के बिना स्वतंत्रता से वंचित नहीं किए जा सकते।
प्रमुख न्यायनिर्णय:
- M.H. Hoskot बनाम महाराष्ट्र राज्य (AIR 1978 SC 1548): सुप्रीम कोर्ट ने विधिक प्रतिनिधित्व को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निष्पक्ष सुनवाई का हिस्सा माना।
- Prem Shankar Shukla बनाम दिल्ली प्रशासन (AIR 1980 SC 1535): बिना उचित कारण हथकड़ी लगाना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन माना गया।
2. अधिवक्ता अधिनियम, 1961
यह अधिनियम भारत में अधिवक्ताओं के अधिकार और कर्तव्यों को नियंत्रित करता है।
- धारा 29: केवल अधिवक्ता ही भारत की अदालतों में प्रैक्टिस कर सकते हैं। यदि पुलिस अधिवक्ता के वैध पेशेवर कार्य में बाधा डालती है, तो यह अधिकार का उल्लंघन है।
- धारा 35: अधिवक्ताओं के आचरण पर केवल बार काउंसिल अनुशासनात्मक कार्यवाही कर सकती है। पुलिस मनमाने ढंग से अधिवक्ता के पेशेवर आचरण में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
प्रमुख न्यायनिर्णय:
- In Re: C.K. Daphtary बनाम O.P. Gupta (AIR 1971 SC 1132): अधिवक्ता के प्रैक्टिस में हस्तक्षेप को गंभीर अवैध कार्य माना गया।
3. भारतीय बार काउंसिल नियम
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अधिवक्ता अधिनियम के अंतर्गत नियम बनाए हैं, जिनमें अधिवक्ताओं की गरिमा और पेशेवर स्वतंत्रता को मान्यता दी गई है।
- अध्याय II, भाग VI: इसमें अधिवक्ता के कर्तव्यों और आचार संहिता का वर्णन है। पुलिस द्वारा अनुचित हस्तक्षेप को अधिवक्ता की गरिमा के विरुद्ध माना गया है।
- नियम 7: अधिवक्ता को अपने मुवक्किल से हुई गोपनीय बातचीत उजागर करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। पुलिस द्वारा इस गोपनीयता का उल्लंघन गैरकानूनी है।
4. पुलिस दुव्यवहार के विरुद्ध उपाय
यदि अधिवक्ता पुलिस दुव्यवहार या मनमानी का सामना करते हैं, तो उनके पास कई कानूनी उपाय उपलब्ध हैं:
- रिट याचिका (अनुच्छेद 32 व 226): मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में सीधे सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में रिट दाखिल की जा सकती है।
- बार काउंसिल में शिकायत: राज्य बार काउंसिल अथवा बार काउंसिल ऑफ इंडिया में पुलिस हस्तक्षेप की शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
- आपराधिक शिकायत: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 341 (ग़लत रोक), 342 (ग़लत कैद), 506 (आपराधिक डराना-धमकाना) आदि के अंतर्गत शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
प्रमुख न्यायनिर्णय:
- Nand Lal Balwani बनाम महाराष्ट्र राज्य (1990 CriLJ 1726): अधिवक्ता को न्यायालय का अधिकारी मानते हुए अवैध पुलिस कार्रवाई से सुरक्षा की पुष्टि की गई।
- Delhi Judicial Service Association बनाम गुजरात राज्य (AIR 1991 SC 2176): न्यायिक अधिकारी की अवैध गिरफ्तारी के संदर्भ में यह सिद्धांत रखा गया कि अधिवक्ताओं को भी मनमानी हिरासत से सुरक्षा प्राप्त है।
5. हाल के विकास
न्यायपालिका ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि अधिवक्ताओं को उनके पेशेवर कार्यों के चलते पुलिस द्वारा परेशान नहीं किया जा सकता।
प्रमुख न्यायनिर्णय:
- Shiv Shankar Singh बनाम बिहार राज्य (2019 SCC Online SC 1324): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिवक्ता को उनके पेशेवर दायित्व निभाते समय परेशान न करे।
- Smt. Pramodini Mohapatra बनाम उड़ीसा राज्य (AIR 2014 SC 1799): कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिवक्ता के प्रति उच्च-handed व्यवहार नहीं कर सकती।
निष्कर्ष
अधिवक्ता न्यायालय के अधिकारी होने के नाते अपने अधिकारों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने के हकदार हैं। संविधान, अधिवक्ता अधिनियम और बार काउंसिल नियम उन्हें पुलिस दुव्यवहार से पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करते हैं। रिट याचिका, आपराधिक शिकायत तथा बार काउंसिल में कार्यवाही जैसे उपाय उपलब्ध हैं। विधिक समुदाय को चाहिए कि वह इन अधिकारों का दृढ़ता से उपयोग कर कानूनी पेशे की गरिमा की रक्षा करे।




