नई दिल्ली, 15 अगस्त 2025 — देश के मुख्य न्यायाधीश भुशन रामकृष्ण गवई ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के कार्यक्रम में उद्घोष किया कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों संवैधानिक रूप से समान कोर्ट हैं, और इनमें से कोई भी अदालत दूसरी से श्रेष्ठ या अधीन नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम हाई कोर्ट कॉलेजियम को किसी विशेष नाम की सिफ़ारिश करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। अदालतों में समानता बनाए रखने का यह वक्तव्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान की प्रतिष्ठा पर विश्वास का परिचायक है।
CJI गवई ने यह भी बताया कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया हाई कोर्ट कॉलेजियम से शुरू होती है—वे ही पहले निर्णय लेते हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट केवल नाम सुझा सकता है, और तभी अन्य पक्ष की संतुष्टि पर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है।
उन्होंने पूर्व CJI संजीव खन्ना द्वारा शुरू की गई एक प्रथा का भी उल्लेख किया, जिसमें उम्मीदवारों से सीधे बातचीत (10–30 मिनट तक) की जाती है ताकि उनकी क्षमता और सामाजिक योगदान की समझ विकसित की जा सके।
CJI गवई ने वकीलों और न्यायाधीशों से आग्रह किया कि वे प्रत्येक मामले को—भले ही वह मामूली प्रतीत हो—न्याय और लोकतंत्र की दृष्टि से गंभीरता से लें, क्योंकि किसी अन्य व्यक्ति के लिए वह जीवन, गरिमा या अस्तित्व का प्रश्न हो सकता है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के महान नायकों जैसे संथाल विद्रोह, बिरसा मुंडा, ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले, टैगोर, गांधी, आंबेडकर और मौलाना आजाद को याद करते हुए कहा कि हमारी न्यायपालिका को संविधान की ऐसी मूल भावना से निर्देशित होना चाहिए।
उन्होंने भारत की प्रगति का प्रतीक बताते हुए संथाल समुदाय की बेटी द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद तक पहुँचना उदाहरण रखा, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि समान, सुरक्षित और न्यायपूर्ण भारत की दिशा में अभी और कार्य करना बाकी है।




