नई दिल्ली, 20 अगस्त 2025 – भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि किशोरों के आपसी सहमति से बने प्रेम संबंधों पर POCSO अधिनियम लागू नहीं होना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि “प्रेम करना अपराध नहीं है,” और किशोरों को अपराधी मानकर जेल भेजना न्यायसंगत नहीं है।
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरथना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि वास्तविक यौन शोषण और किशोरों के बीच स्वेच्छा से बने संबंधों में अंतर किया जाना ज़रूरी है। पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में संवेदनशीलता और न्यायसंगत दृष्टिकोण आवश्यक है, न कि कठोर दंडात्मक रवैया।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि कई बार नाबालिग लड़कियों के माता-पिता सामाजिक दबाव या तथाकथित “सम्मान” के नाम पर प्रेम संबंधों को आपराधिक रूप देने के लिए POCSO का उपयोग कर लेते हैं, जिससे कई बार “सम्मान हत्याओं” जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रवृत्ति को खतरनाक बताते हुए आगाह किया कि ऐसे मामलों में कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
न्यायालय ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग जैसे संस्थानों द्वारा किशोर प्रेम संबंधों से जुड़े मामलों को बार-बार चुनौती दिए जाने पर भी सवाल उठाया। पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में इन संस्थाओं का कोई प्रत्यक्ष कानूनी अधिकार (locus standi) नहीं बनता।
संक्षिप्त पृष्ठभूमि
- कई उच्च न्यायालयों ने किशोर प्रेम संबंधों में सुरक्षा प्रदान करने वाले आदेश दिए थे।
- इन आदेशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।
- अदालत ने राज्यों की पुलिस को भी निर्देश दिया कि वे ऐसे मामलों में जल्दबाज़ी में गिरफ्तारी न करें और प्रत्येक प्रकरण की गहन विवेचना के बाद ही आगे की कार्यवाही करें।
लेखक की राय में
कानूनी दृष्टि से POCSO अधिनियम की कठोर धाराएँ, जैसे अनिवार्य रिपोर्टिंग और कठोर उत्तरदायित्व (strict liability), कई बार किशोर प्रेम संबंधों को भी अपराध मान लेती हैं। यह प्रवृत्ति कानून के मूल उद्देश्य से भटकाव है, क्योंकि अधिनियम का मक़सद बच्चों को शोषण और वास्तविक यौन अपराधों से बचाना है, न कि किशोरों की भावनाओं को अपराध घोषित करना।
संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रभावित होता है, जब भावनात्मक या विकासात्मक संबंधों को अपराध की श्रेणी में डाल दिया जाता है। न्यायशास्त्र यह कहता है कि कानून का उद्देश्य सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत गरिमा को संतुलित करना होना चाहिए।
यदि न्यायालय यह स्पष्ट करता है कि “प्रेम करना अपराध नहीं है” और हर मामले को परिस्थितियों के अनुसार परखा जाना चाहिए, तो यह एक प्रगतिशील और संवैधानिक दृष्टिकोण है। यह किशोरों के आत्मनिर्णय, मानसिक स्वास्थ्य और विकास का सम्मान करता है और साथ ही POCSO के मूल उद्देश्य को भी अक्षुण्ण रखता है।
लेखक की राय में, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायव्यवस्था में एक संवेदनशील और मानवीय अध्याय जोड़ता है। यह न केवल किशोरों की भावनाओं की रक्षा करता है, बल्कि समाज को भी यह संदेश देता है कि प्रेम संबंधों और शोषण के अपराधों में स्पष्ट अंतर किया जाना अनिवार्य है।




