दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारत की सबसे बड़ी और सुरक्षित मानी जाने वाली तिहाड़ जेल को लेकर गंभीर टिप्पणी करते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को एक एफआईआर दर्ज कर जांच करने का आदेश दिया है। यह मामला एक व्यापारी और पूर्व कैदी मोहित कुमार गोयल की याचिका से जुड़ा है। गोयल ने आरोप लगाया कि जेल अधिकारियों और कुछ कैदियों की मिलीभगत से उनसे “प्रोटेक्शन मनी” के नाम पर पैसे वसूले गए।
याचिकाकर्ता के अनुसार, जून से अगस्त 2024 तक जेल में रहते हुए उनसे करीब 15 लाख रुपये जबरन लिए गए, ताकि उन्हें फ़ोन और वीडियो कॉल जैसी बुनियादी सुविधाएँ मिल सकें। अदालत ने इसे “बेहद परेशान करने वाला और चौंकाने वाला” बताया और कहा कि यह आरोप पूरे कारागार तंत्र पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हैं।
इस घटना के बाद दिल्ली सरकार ने नौ जेल अधिकारियों को निलंबित कर स्थानांतरित कर दिया है और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है। अदालत ने सीबीआई और दिल्ली सरकार को आठ सप्ताह में जांच रिपोर्ट पेश करने का समय दिया है। अगली सुनवाई 28 अक्टूबर 2025 को होगी।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने साथ ही तिहाड़, मंडोली और रोहिणी जेलों के लिए एक विशेष परामर्श (advisory) जारी करने का भी निर्देश दिया है, ताकि भविष्य में ऐसी अनियमितताओं को रोका जा सके।
लेखक के विचार
तिहाड़ जेल में उजागर हुआ यह मामला केवल एक व्यक्ति या एक संस्था की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे सुधारगृह प्रणाली की कमजोरी को सामने लाता है। जेलें केवल अपराधियों को कैद करने की जगह नहीं हैं, बल्कि यह व्यवस्था सुधार और पुनर्वास का केंद्र भी होनी चाहिए। लेकिन यदि वहाँ ही रिश्वत, उगाही और सत्ता का खेल चलने लगे, तो यह न्यायपालिका और लोकतंत्र दोनों पर गहरी चोट है।
ज़रूरत इस बात की है कि जेल प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। नियमित निगरानी, स्वतंत्र जांच और तकनीकी निगरानी तंत्र को मजबूत करना अब अपरिहार्य हो चुका है। केवल कुछ अधिकारियों को निलंबित करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। इस दिशा में संस्थागत सुधार ही न्याय और मानवाधिकारों की असली गारंटी दे सकते हैं।




