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Wednesday, December 10, 2025

क्या अंग्रेज़ी न बोल पाने वाला अधिकारी कार्यकारी पद संभालने के योग्य होता है?, उत्तराखंड उच्च न्यायालय

यह दृष्टिकोण उचित है जब अधिकारी अंग्रेज़ी पढ़ और समझ सकता है, और आदेश हिंदी या अंग्रेज़ी में जारी कर सकता है। अदालत को चाहिए कि ऐसे अधिकारियों के लिए सहयोगकारी माहौल बनाए — जैसे कि ट्रांसलेटर या उनके पैरलीयर की मदद — ताकि भाषा क्षमताएँ उनके प्रशासनिक कार्यों को बाधित न करें।

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देहरादून, 25–27 जुलाई 2025 की सुनवाई में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि क्या एक Additional District Magistrate (ADM) — श्री विवेक राय — जो स्वयं कहते हैं कि वे अंग्रेज़ी बोल नहीं सकते लेकिन समझ सकते हैं, एक संवैधानिक कार्यकारी पद प्रभावी रूप से संभाल सकते हैं।

इन सुनवाईयों के दौरान न्यायाधीशों ने ADM से अंग्रेज़ी में संवाद की उम्मीद की, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया, “मैं अंग्रेज़ी समझ सकता हूँ, पर बोल नहीं सकता।” इस पर अदालत ने राज्य निर्वाचन आयुक्त और मुख्य सचिव से निर्देश दिया कि इस बात का विश्लेषण हो कि क्या इस तरह की भाषा सीमितता अधिकारी की कार्यक्षमता में बाधा उत्पन्न करती है?

यह विवाद उसी दिन उभरा जब अदालत एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रही थी, जिसमें अदालत ने उत्तर प्रदेश पंचायत राज नियम 1994 के तहत केवल “फैमिली रजिस्टर” के आधार पर मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाया था। निर्वाचन अधिकारियों ने स्वीकार किया कि उन्होंने अतिरिक्त दस्तावेजों के बिना केवल परिवार रजिस्टर पर निर्भरता की है। अदालत ने देखा कि नियमें स्पष्ट रूप से जन्म/मृत्यु प्रमाणपत्र या विद्यालय प्रवेश रजिस्टर जैसे दस्तावेजों का उल्लेख करती हैं, न कि केवल परिवार रजिस्टर।

इस स्थिति ने स्पष्ट रूप से भाषा नीति, प्रशासनिक दक्षता, और संवैधानिक जवाबदेही पर बहस शुरू कर दी है। जहां एक तरफ हिंदी को भारत की राजभाषा माना गया है, वहीं उच्च न्यायालयों और प्रशासनिक संवादों में अंग्रेज़ी का प्रयोग आज भी अनिवार्य बना हुआ है। ADM जैसे संवेदनशील पद पर कार्यरत अधिकारी की भाषा क्षमता केवल संवाद की सुविधा नहीं, बल्कि निर्णय प्रवाहा, कार्यान्वयन और संवैधानिक प्रक्रिया की कुशलता सुनिश्चित करने का आधार भी होती है।


विश्लेषणात्मक राय by Lawyerspress.in

संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया है, लेकिन अनुच्छेद 348 उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय और विधायी प्रक्रियाओं में अंग्रेज़ी के प्रयोग को जारी रखने की अनुमति देता है ताकि न्यायिक एवं प्रशासनिक गतिविधियाँ सुचारू रूप से चल सकें।

जहा तक विवेक राय का कथन है —

“If officer write and understand English but not speak English fluently, I think he is a competent officer because he understands the communication letters, passes orders in English or Hindi. Hon’ble Court must cooperate with him through translator or his pleader.”

यह दृष्टिकोण उचित है जब अधिकारी अंग्रेज़ी पढ़ और समझ सकता है, और आदेश हिंदी या अंग्रेज़ी में जारी कर सकता है। अदालत को चाहिए कि ऐसे अधिकारियों के लिए सहयोगकारी माहौल बनाए — जैसे कि ट्रांसलेटर या उसके प्लीडर की मदद — ताकि भाषा क्षमताएँ उनके प्रशासनिक कार्यों को बाधित न करें।

संक्षेप में:

  • PCS/IAS जैसी सेवा चयन परीक्षाओं में कार्यात्मक अंग्रेज़ी संवाद क्षमता का परीक्षण अनिवार्य होना चाहिए।
  • वर्तमान ADM और अन्य अधिकारियों को अंग्रेज़ी में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे सरकारी दस्तावेजों, न्यायालय के निर्देशों और संवादों को प्रभावी रूप से समझ सकें।
  • प्रशासनिक नियुक्ति, प्रमोशन और स्थानांतरण नीतियों में भाषा दक्षता को स्पष्ट मानदंड के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।

भाषा केवल एक माध्यम नहीं है, बल्कि प्रभावी प्रशासन, पारदर्शिता तथा संवैधानिक उत्तरदायित्व की रीढ़ होती है। ADM जैसे उच्च पदों पर भाषा में अक्षमता प्रणालीगत जोखिम पैदा कर सकती है, और इसलिए समय रहते सुधारात्मक नीतियाँ बनना आवश्यक है।


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